Wednesday, November 4, 2015

एक मुलाक़ात अपने आप से.....


बीते कल से कुछ सपने उधार ले फिर जीने की कोशिश कर रही हूँ ।

 मेरे ही अन्दर हैँ सब जवाब इस यक़ीन पे यक़ीन करने की कोशिश कर रही हूँ।

मेरा अपना दिल ही नाराज़ है मुझसे कि क्यूँ खोजा मैंने सुकूँ बाहर

जो वादा था इससे जीने का, न झुकने  का,  न माँगने का

फिर क्यों बेसब्र हो गई , क्यों हो गई काफ़िर ?
 
गिरते पड़ते दो क़दम चढ़ती हूँ फिर चार क़दम फ़िसल  आती हूँ
लेकिन थमना नहीँ है अब
कभी तो चार क़दम की चढ़ाई होगी और दो  क़दमों की फ़िसलन 
तब तक माज़ी में कहे अपने ही  अल्फ़ाज़ों को छूते रहना है
 
अपने ही पुराने आप से अपनी मुलाक़ात कराते रहना है 
जब तक दोनों  फिर न मिल जाएँ 
मैं अपने आप से 
मेरा दिल मेरी मंज़िल से
 

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